जानें स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कैसे हुई थी

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स्वामी विवेकानंद को कौन नहीं जानता है. उन्होंने पूरे विश्व में भारत की सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म से परिचय करवाया था. उन्होंने विश्व धर्म सम्मेलन जो कि अमेरिका के शिकागो में हुआ था में भाग लिया और अपने विचारों से पूरी दुनिया को अवगत करवाया. उनकी मृत्यु 1902 ई. में हुई थी. क्या आप जानते हैं उनकी मृत्यु के पीछे के कारण को? आइये इस लेख के माध्यम से उनके और उनकी मृत्यु के कारण के बारे में जानते हैं.

उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये.” – स्वामी विवेकानंद 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता (पहले कलकत्ता) में हुआ था. उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था. वे काफी तीव्र बुद्धि वाले थे. जब उन्होंने रामक्रष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनी तो वो उनके पास कुछ तर्क करने के उद्देश्य से गए थे लेकिन रामक्रष्ण जी पहचान गए थे कि ये वही शिष्य है जिनका उनको काफी समय से इंतज़ार था. आगे चलकर विवेकानंद जी के गुरु रामकृष्ण ही हुए. स्वामी विवेकानंद ने 25 वर्ष में ही गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था और इसके बाद पैदल ही उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष की यात्रा की. स्वामी विवेकानंद जी का दृण विश्वास था की अध्यात्म-विद्या और भारत दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा. उन्होंने रामकृष्ण मिशन की भारत में और विदेश में कई शाखाएँ स्थापित की. इस तथ्य के बारे में कोई रहस्य नहीं है कि स्वामी विवेकानंद की मृत्यु 1902 ई. में हुई थी. लेकिन हम सभी को उनके निधन के पीछे के असली कारणों की जानकारी नहीं है. इस लेख में हम स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के साथ-साथ उनके जीवन के जुड़े कुछ अज्ञात पहलुओं से संबंधित विभिन्न सिद्धांतों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं.
 स्वामी विवेकानंद की मृत्यु
स्वामी विवेकानंद को 31 से अधिक बीमारियां थी, जिनमें से एक बीमारी उनका निद्रा रोग से ग्रसित होना भी था। अपने जीवन के अन्तिम दिन स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्यों के बीच शुक्ल-यजुर्वेद की व्याख्या की थी और कहा कि “यह समझने के लिये कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है हमें एक और विवेकानंद चाहियेl” उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो-तीन घंटे तक ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली थी.उनके निधन की वजह तीसरी बार दिल का दौरा पड़ना था। उनकी अंत्येष्टि बेलूर में गंगा के तट पर चन्दन की चिता पर की गयी थी.इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था। अपनी मृत्यु के समय विवेकानंद की उम्र 39 वर्ष थी.

“बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप हैं”. – स्वामी विवेकानंद 

अपनी भविष्यवाणी को पूरा किया
विवेकानंद ने अपनी मृत्यु के बारे में पहले की भविष्यवाणी कर रखी थी कि वह चालीस वर्षों तक जीवित नहीं रहेंगे.इस प्रकार उन्होंने महासमाधि लेकर अपनी भविष्यवाणी को पूरा किया.

आइए अब हम विवेकानंद से संबंधित कुछ अन्य पहलुओं को जानते हैं.
कई सुधारों एवं पहल के अगुआ
स्वामी विवेकानंद वेदांत और योग को पश्चिमी विश्व के देशों में प्रारंभिक रूप में स्थापित करने वाले एक प्रमुख व्यक्ति थे.उन्हें 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हिन्दू धर्म को एक प्रमुख विश्व धर्म के स्तर तक लाने और लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है.
हिन्दू धर्म का पुनरूद्धार
वह भारत में हिन्दू धर्म के पुनरूत्थान के प्रमुख स्तंभ थे और उन्होंने औपनिवेशिक भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा में महत्वपूर्ण योगदान दिया था.विवेकानंद ने हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी.
प्रसिद्ध भाषण
स्वामी विवेकानंद को शायद उनके उस प्रेरक भाषण के लिए भी जाना जाता है, जो उन्होंने 1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म के प्रचार के दौरान दिया था.उन्होंने अपने भाषण की शुरूआत “अमेरिका के भाइयों और बहनों…” के साथ किया था जिसके कारण उस सभा में काफी देर तक तालियाँ बजती रही थी.

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Image source: Sanatana Dharma – blogger
एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व
वर्तमान समय में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लोग सवामी विवेकानंद को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं और उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चल रहे हैं.

उप्तोक्त लेख से ज्ञात होता है कि सवामी विवेकानंद की मृत्यु 1902 ई. में हुई थी. उनके निधन के पीछे क्या असली कारण था इत्यादि.

“किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये – आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं.” – स्वामी विवेकानंद 

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